भारत की शिक्षा प्रणाली

भारत की शिक्षा प्रणाली

 

भारत में मोदी सरकार के 10 वर्ष पूरे हो गए और बहुत प्रचार और प्रसार है कि जो हो रहा है बहुत अच्छा हो रहा है।  जब इस  तरह का प्रचार प्रसार हो तो देखने की आवश्यकता है कि कुछ ऐसा तो नहीं जिस में कमी रह गई है। 


दुनिया  में जिन देशों ने प्रगति की है उनमें   शिक्षा ने महत्वपूर्ण योगदान किया है।  भारत में शिक्षा क्षेत्र का क्या हाल है? 


साक्षरता को आमतौर पर शिक्षा का  उदेश्य मान लिया जाता है। भारत की साक्षरता दर पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ रही है। 2011 तक, राष्ट्रीय साक्षरता दर 74.04% थी, जिसमें केरल 93% के साथ शीर्ष पर था। दूसरी ओर, बिहार में साक्षरता दर सबसे कम 61.8% है। पुरे देश  में साक्षरता दर इस प्रकार है: शहरी क्षेत्र: 87.7%, ग्रामीण क्षेत्र: 73.5%; पुरुष साक्षरता दर:84.7%; महिला साक्षरता दर: 70.3%. 


साक्षरता महत्वपूर्ण है।  परन्तु असल में शिक्षा के दो अन्य महत्वपूर्ण उदेश्य हैं: जीवन जीने की कला और जीविका अर्जित करने की कला।  क्या हमारी शिक्षा प्रणाली इन दो उदेश्यों की तरफ ध्यान देती है।  


मोदी सरकार ने 2020 में भारत की नई शिक्षा नीति (एनईपी) को लागु किया और  2023 में कुछ संशोधन किये। उद्देश्य था  व्यापक सुधार और  भारत को वैश्विक   महाशक्ति के रूप में स्थापित करना। इस शिक्षा प्रणाली में  बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान को हासिल करने पर तो ज़ोर है। दूसरा मोदी सरकार की सोच के अनुसार भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान प्रणालियों पर गर्व को बढ़ावा देने पर भी ज़ोर है।   परन्तु जीवन जीने की कला का कहीं ज़िक्र नहीं।   


इसी तरह से व्यावसायिक पाठ्यक्रमों  का ज़िक्र है।  परन्तु क्या स्कूल पाठ्यक्रम से पास किये विद्यार्थी व्यवसाय में सफल हो जाते हैं? इस पर प्रश्न चिन्ह है। देश में डेमोग्राफिक डिविडेंड का बहुत ज़िक्र है।  आजकल 35 वर्ष से कम की आयु की जनसँख्या बहुत है।  परन्तु क्या उनके पास कार्यकुशलता है? व्यवसाय में सफल होने के लिए कौशल का होना अनिवार्य है।  मोदी सरकार  ने कौशल विकास केंद्र भी खोले हैं परन्तु उनकी गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह हैं।  क्या इन केंद्रों से देश के लिए सक्षम प्लम्बर, इलेक्ट्रीशियन, कारपेंटर, इत्यादि बन रहे हैं? 


औपचारिक शिक्षा के लिए मनुष्य को  3 से 18 वर्ष की आयु तक स्कूल/ कॉलेज में जाना अनिवार्य है।  क्या देश में इतने  स्कूल और कॉलेज हैं जिन में देश की जनता अनिवार्य शिक्षा  हासिल कर सके।  सरकारी स्कूल तो इतने नहीं हैं।  जितने हैं भी उनकी गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह है।  प्राइवेट स्कूल और कॉलेज इस की आपूर्ति करते हैं। प्राइवेट स्कूल कॉलेज खोलने वालों ने शिक्षा को एक व्यवसाय बना लिया है। सस्ते दामों पर सरकार से ज़मीन खरीद लेते हैं और फिर अपनी मनमर्ज़ी से स्कूल और कॉलेज चलाते हैं।  फीस ज़्यादा और अध्यापकों को सैलरी कम। अध्यापक तो ठेके पर भी रख लेते हैं।  प्राइवेट स्कूलों में कुछ कार्य ऐसे हैं जिन में माफिया पैदा हो गए हैं:  स्कूल/ कॉलेज  एडमिशन डोनेशन माफिया, विद्यार्थिओं   के लिए उनकी पुस्तकों, स्टेशनरी, यूनिफार्म और ट्रांसपोर्ट इत्यादि का माफिया ।   


देश में बहुत ज़िक्र होता है कि हमारे यहाँ गुरुकुल हुआ करते थे जो जीवन जीने की कला सिखाते थे।  इलज़ाम लगाया जाता है कि अंग्रज़ों ने गुरुकुल प्रथा पर प्रहार किया और मैकाले की शिक्षा निति के अनुसार क्लर्क पैदा करने शुरू कर दिए।  अब तो देश को आज़ाद हुए 77 वर्ष हो गए। नई शिक्षा निति भी आ गई।  अब हम फिर से क्यों अपनी खोई हुई विरासत को वापिस लेकर नहीं आते।  अंग्रेज़ों ने गुरुकुलों पर प्रहार किया।  आजकल मदरसों पर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं।  अगर मदरसों को बंद करेंगे तो गुरुकुल कैसे वापिस आ सकते हैं।  


शिक्षा को प्रभावी होने के लिए सही शिक्षकों का होना अनिवार्य है। शिक्षकों का अवलोकन करें तो लगता है कि देश में अच्छे शिक्षकों की कमी है।  शिक्षा के क्षेत्र में वह लोग जाते हैं जिन को और कहीं जॉब नहीं मिलती।  अगर कुछ अच्छे अध्यापक बन जाते हैं तो वह प्राइवेट कोचिंग पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं।  यह प्राइवेट कोचिंग इसी लिए ज़्यादा लोकप्रिय है क्योंकि स्कूल और कॉलेज में सही पढाई नहीं होती।  


शिक्षा के क्षेत्र में और भी बहुत दोष उजागर हुए हैं। शिक्षकों के चयन में हेराफेरी को लेकर देश के एक मुख्य मंत्री को जेल में जाना पड़ा।  अगर शिक्षकों का चयन ही गलत है तो शिक्षा का स्तर क्या होगा।  कई जगह तो ऐसा सुनाने में आता है कि शिक्षक स्वयं तो स्कूल जाते नहीं और भाड़े पर रखे लोगों को अपनी जगह भेज देते हैं।  परीक्षा में नक़ल करना और कराना तो अब एक व्यवसाय बन गया है।  नकली डिग्रियां और फर्जीवाड़ा शिक्षा के क्षेत्र में आम है।  मेडिकल कॉलेजेस और इंजीनियरिंग कॉलेजेस में डोनेशन के बिना एडमिशन नहीं मिलती।  और डोनेशन देकर अयोग्य व्यक्ति डॉक्टर बनेगे तो क्या ही ईलाज़ करेंगे।  देश के युवा गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा लेने के लिए विदेशों में जाने के लिए मजबूर हैं।  


ऐसा नहीं हैं की सब कुछ दोषपूर्ण ही है।  देश में शिक्षा के कारण हमें गर्व करने को भी बहुत कुछ है।  देश में बहुत अच्छे स्कूल कॉलेज और विश्व विद्यालय भी हैं।  देश में शिक्षक भी बहुत अच्छे हैं।  इसी के कारण देश के बहुत लोग अच्छी शिक्षा प्राप्त कर ना केवल देश में बल्कि विदेशों में भी बहुत सफल हुए हैं।  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई कंपनियों के CEO भारतीय हैं।  हमारे यहाँ के IIT/ IIM में विश्व स्तर की पढाई की जाती है।  कई सरकारी स्कूलों के अध्यापक भी बहुत अच्छे हैं।  देश के अधिकांश सफल लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि वह सरकारी स्कूलों के तख्तों पर बैठ कर पढ़े और अब महत्वपूर्ण व्यवसाय में सफल हैं।  इसका श्रेय  वह आपने अध्यापकों को ही देते हैं।  परन्तु इस तरह की गुणवत्ता के लिए और गुणपूर्ण  शिक्षा को सर्वव्यापी बनाने के लिए शिक्षा प्रणाली के दोषों का निवारण करना अनिवार्य है।  मात्र नई  शिक्षा निति बना लेना ही पर्याप्त नहीं है। 


सतीश कालड़ा 

बैंगलोर 

08.10.2024 













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