मेरा भारत देश महान
मेरा भारत देश महान
भारत की 78वी वर्षगांठ
सतीश कालरा
ऋषिकेश
भारत को आज़ाद हुए 77 वर्ष हो गए। 15 अगस्त 1947 को हासिल हुई इस आज़ादी से पूर्व 200 वर्ष तक अंग्रेज़ों का राज रहा और उस के पूर्व करीब 800 वर्ष तक देश में मुस्लिम आक्रांताओं का बोलबाला रहा। कहने को यह कहा जाता है कि 1947 में प्राप्त आजादी अंग्रेजो से आजादी थी। परंतु स्वतंत्रता के इस दिन भारत का विभाजन धर्म के आधार पर किया गया और पाकिस्तान को मुस्लिम देश घोषित किया गया। तात्पर्य यह था कि वह कार्यकाल जिस ने भारत में मुस्लिम संस्कृति को जन्म दिया वह आपने अलग देश चाहती थी। परंतु ऐसा पूर्णतय हुआ नहीं। देश के उस समय के कर्णधार जो इस भ्रम में रहे कि उनके कारण देश को आजादी मिली उन्हों ने दरियादिली दिखा कर कहा कि जो मुस्लिम भारत को नहीं छोड़ना चाहते वह भारत में रह सकते हैं। नतीजा यह हुआ कि भारत से अंग्रेज हुक्मरान तो चले गए परन्तु मुस्लिम और ईसाई संस्कृति को भारत की संस्कृति का हिस्सा ही मान लिया गया। वैसे भी स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि भारत ने पृथ्वी के सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को शरण दी है। मुस्लिम और ईसाई भारत में शरण लेने तो नहीं आए थे बल्कि आक्रांता थे परंतु देश के कर्णधारों ने उन्हें देश का भाग ही समझ लिया था। आज का भारत धर्मनिरपेक्ष भारत है जिस में सब को अपने आपने पंथ के अनुसार जीवन यापन करने की छूट है। देश की कई समस्याएं इसी कारण से भी हैं और हो सकता है आने वाले दशकों में यह धार्मिक ध्रुवीकरण एक बहुत जटिल समस्या बन कर सामने आए।
इस बात का विपरीत यह है कि मुस्लिम आक्रांता भारत में 800 साल रहे। इसका अर्थ यहां आने के बाद उनके
वंशज यहीं पैदा हुए , यहीं पले बढ़े , यहां की संस्कृति को अपनाया और अपनी संस्कृति का प्रभाव भी छोड़ा
और इन्हीं आठ सौ वर्षों दौरान कबीर ,रहमान , इकबाल ,गालिब , बुल्लेशाह ,डा॰ ज़ाकिर हुसैन, डा॰कलाम
और न जाने कितने मुसलमान हुए जिन्होंने देश के लिए मानव जाति के जो महान कार्य किए यह सोचकर नहीं
कि वो आक्रांताओं के वंशज हैं और बाहर से आए हैं । वो यहां पैदा हुए , यहां के त्योहारों का ,यहां की
आबोहवा का हिस्सा बने तो फिर यहां की संस्कृति का हिस्सा तो अपने आप ही बन गए ।
कब तक इन्हें बाहर से आए हुए कहते रहेंगे । “1947 में कर्णधारों ने मुसलमानों को या ईसाईयों को देश का भाग
ही समझ लिया “… कुछ बात समझ नहीं आई ! क्यों ये क्या देश का भाग नहीं ???
पिछली बातें छोड़िए । यह स्वीकार करना ही पड़ेगा और करना भी चाहिए कि हमारा देश किसी एक
विशेष धर्म को ध्रुवी नहीं माना जा सकता तभी यहां परस्पर भाईचारा और शांति संभव है और
इसके लिए हर प्रयास करना चाहिए न कि इसको और जटिल समस्या बना दिया जाए ।
भाग 1: भारत का इतिहास:
कहते हैं जो लोग अपने इतिहास को भूल जाते हैं उनको अपना इतिहास फिर से दोहराना पड़ता है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर आइए देश के इतिहास पर एक नजर दौड़ाते हैं। फिर दूसरे भाग में देखेंगे स्वतंत्रता संग्राम की कहानी और तीसरे भाग में देखेंगे स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात 77 वर्ष का सफर। चौथे भाग में देखेंगे आने वाले 25 वर्ष का विज़न।
मुगल और अंग्रेजी शासन से पहले, भारतीय उपमहाद्वीप आधुनिक अर्थों में एक एकीकृत राष्ट्र नहीं था। यानि आजकल के हिसाब से पूरे देश का एक राजा/ महाराजा/ नेता, एक संविधान और एक झंडा नहीं था। शायद यह विश्व में कहीं भी प्रचलित नहीं था। इसके बजाय, यह विभिन्न राज्यों, साम्राज्यों और क्षेत्रीय शक्तियों का एक जटिल परिदृश्य था, जिसमें कोई निर्धारित सीमाएँ नहीं थी। यह राज्य एक दूसरे से मैत्री के गठबंधन में होते थे या लड़ते भी रहते थे। इस कालखंड में इस भूखंड में कई महत्वपूर्व साम्राज्य रहे। संक्षिप्त में उन का जिक्र नीचे दिया गया है। विस्तार में इनके बारे में अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि भारतीय संस्कृति के बारे में हमें जानकारी मिल सके।
भारतीय उप महाद्वीप को एक साथ जोड़ने वाले सामान्य कारक थे:
1. भूगोल: भारतीय उपमहाद्वीप का अनूठा भूगोल, जिसमें उत्तर में हिमालय, दक्षिण में हिंद महासागर और सिंधु और गंगा नदी प्रणालियाँ हैं, ने साझा स्थान की भावना पैदा की।
2. संस्कृति: साहित्य (जैसे, महाभारत और रामायण), कला, वास्तुकला और दर्शन सहित एक साझा सांस्कृतिक विरासत ने क्षेत्र की विविध आबादी को जोड़ा।
3. व्यापार और वाणिज्य: सिल्क रोड जैसे व्यापक व्यापार नेटवर्क ने उपमहाद्वीप के क्षेत्रों को जोड़ा और विचारों, वस्तुओं और संस्कृतियों के आदान-प्रदान को सुविधाजनक बनाया।
यद्यपि आधुनिक अर्थों में भारतीय उपमहाद्वीप एक एकीकृत राष्ट्र नहीं था, लेकिन मुगल और अंग्रेजी शासन से पहले यह राजनीतिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंधों के एक जटिल जाल से घिरा हुआ था, जो क्षेत्रीय सीमाओं से परे था। इस लिए इसे अखंड भारत कहा जाता था।
मुस्लिम प्रभाव से पहले भारत का संक्षिप्त इतिहास इस प्रकार है। समय और कल सांकेतिक हैं। इनमें मतभेद हो सकता है।
सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1300 ईसा पूर्व)
उन्नत वास्तुकला, जल प्रबंधन और व्यापार नेटवर्क के साथ परिष्कृत शहरी सभ्यता। प्रमुख शहर: मोहनजो-दारो, हड़प्पा और लोथल
वैदिक काल (1500-500 ईसा पूर्व)
- आर्यों का काल और वेदों, प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों की रचना
- हिंदू धर्म, जाति व्यवस्था और संस्कृत भाषा का विकास
- प्रमुख साम्राज्य: कुरु, पंचाल और कोसल
महाजनपद (600-300 ईसा पूर्व)
- मगध, कोशल और वृज्जि सहित 16 प्रमुख साम्राज्यों का उदय
- बौद्ध धर्म और जैन धर्म का उदय
- प्रमुख हस्तियाँ: बुद्ध, महावीर और सिकंदर का आक्रमण।
मौर्य साम्राज्य (322-185 ईसा पूर्व)
- एकीकृत साम्राज्य चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक महान
- बौद्ध धर्म का प्रसार, कला और वास्तुकला का विकास
- प्रमुख उपलब्धियाँ: अशोक के शिलालेख, मौर्य स्तंभ और पाटलिपुत्र शहर
गुप्त साम्राज्य (320-550 ई.)
- प्राचीन भारत का स्वर्ण युग, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और आर्थिक उन्नति द्वारा चिह्नित
- प्रमुख हस्तियाँ: चन्द्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त और कालिदास (नाटककार)
- उपलब्धियाँ: आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, गणित और साहित्य का विकास
गुप्तोत्तर काल (550-1200 ई.)
- पल्लव, चालुक्य और राजपूतों सहित क्षेत्रीय राज्यों का उदय
- हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म का निरंतर विकास
- प्रमुख हस्तियाँ: आदि शंकराचार्य (हिंदू दार्शनिक) और रामानुज (हिंदू धर्मशास्त्री)
मौर्य, गुप्त और विजयनगर जैसे शक्तिशाली साम्राज्य शाही एकता के दौर थे परंतु ये साम्राज्य पूरे उपमहाद्वीप को शामिल नहीं करते थे। राजनीतिक विखंडन के बावजूद, उपमहाद्वीप में सांस्कृतिक विरासत की एक सांझ थी, जिसमें भाषाएँ (संस्कृत, प्राकृत), धर्म (हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म) और परंपराएँ शामिल हैं।
भाग 2: मुस्लिम प्रभाव और राज
मुसलमान कई कारणों से भारत आए। दरअसल मुसलमान भारत के समृद्ध संसाधनों, जैसे मसाले, वस्त्र और कीमती पत्थरों की ओर आकर्षित हुए। महमूद ग़ज़नी और मुहम्मद गौरी जैसे मुस्लिम शासकों ने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए भारत पर आक्रमण किया। सूफ़ी संत और मिशनरी इस्लाम का प्रचार करने के लिए भारत आए। इस्लामी मिशनरी और सूफ़ी स्थानीय लोगों को इस्लाम में परिवर्तित करने के लिए भारत आए।
उपनिवेशीकरण: मुस्लिम शासकों ने भारत में दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य जैसे उपनिवेश स्थापित किए। इस्लाम ने भारत में विस्तृत आदान-प्रदान किया।
700 ई. से लेकर अब तक भारत का मुस्लिम इतिहास संक्षिप्त में इस प्रकार रहा।
चरण 1:अरब आक्रमण (711-800 ई.): अरब सेनाओं ने सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) पर विजय प्राप्त की और इस्लाम का प्रचार शुरू किया। पश्चिमी भारत में इसका सीमित मुस्लिम प्रभाव रहा।
चरण 2: ग़ज़नवी आक्रमण (1000-1040 ई.) महमूद ग़ज़नी ने उत्तरी भारत पर आक्रमण किया, लाहौर और वाराणसी जैसे प्रमुख शहरों पर कब्ज़ा किया। उत्तर-पश्चिमी भारत में मुस्लिम प्रभाव का विस्तार हुआ।
चरण 3: ग़ौरी विजय (1191-1206 ई.) मुहम्मद ग़ौर ने पृथ्वीराज चौहान को हराया, दिल्ली पर कब्ज़ा किया और मुस्लिम शासन की स्थापना की। उत्तरी और मध्य भारत में मुस्लिम प्रभाव का विस्तार हुआ।
चरण 4: दिल्ली सल्तनत (1206-1526 ई.) मुस्लिम शासकों ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की, जिससे उत्तरी और मध्य भारत में मुस्लिम प्रभाव का विस्तार हुआ। फ़ारसी संस्कृति, कला और वास्तुकला का परिचय।
चरण 5: मुग़ल साम्राज्य (1526-1756 ई.) बाबर ने मुग़ल साम्राज्य की स्थापना की, जिसने भारत के अधिकांश हिस्सों पर मुस्लिम शासन की शुरुआत की। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ जैसे मुग़ल सम्राटों ने मुस्लिम प्रभाव, कला और संस्कृति का विस्तार किया।
चरण 6: क्षेत्रीय मुस्लिम साम्राज्य (1700-1800 ई.) मुग़ल पतन के कारण हैदराबाद, बंगाल और अवध जैसे क्षेत्रीय मुस्लिम साम्राज्यों का उदय हुआ। भारत के विभिन्न भागों में मुस्लिम प्रभाव जारी रहा।
चरण 7: ब्रिटिश औपनिवेशिक युग (1800-1947 ई.) ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने मुस्लिम राजनीतिक प्रभाव को कम कर दिया, लेकिन मुस्लिम संस्कृति और पहचान बनी रही। मुस्लिम सुधार आंदोलन उभरे, जो मुस्लिम समाज को आधुनिक बनाने और पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे थे।
गौर तलब है कि अरब में इस्लाम की उत्पति के बाद इस्लाम का विस्तार बहुत तेजी से सारे विश्व में हुआ। इस्लामी मिशनरी और आक्रांता जहां गए उन्होंने वहां की संस्कृति का 100% इस्लामीकरण कर दिया। परंतु 1000 वर्ष के कार्यकाल में और 800 वर्ष के इस्लामी साम्राज्य के बावजूद भारत का इस्लामीकरण 20% से अधिक नहीं हो पाया। हम कह सकते हैं कि इस में योगदान रहा भारत के साधु संतों का और गुरुकुल, मंदिर और भारतीय समाज की संरचना का। इस संदर्भ में सिख इतिहास का योगदान महत्वपूर्ण है। मुस्लिम शासकों द्वारा दो सिख गुरुओं की हत्या की गई:
1. गुरु अर्जन देव (1563-1606): 5वें सिख गुरु, गुरु अर्जन देव को 1606 में मुगल सम्राट जहांगीर द्वारा इस्लाम धर्म अपनाने से इनकार करने और विद्रोही राजकुमार खुसरो मिर्जा का समर्थन करने के कारण यातनाएं दी गईं और मार डाला गया।
2. गुरु तेग बहादुर (1621-1675): 9वें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर को 1675 में मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा इस्लाम धर्म अपनाने से इनकार करने और कश्मीरी हिंदुओं को जबरन धर्म परिवर्तन से बचाने के कारण मार डाला गया।
इसके अलावा, अन्य सिख गुरुओं को मुस्लिम शासकों से उत्पीड़न और हिंसा का सामना करना पड़ा, जिनमें शामिल हैं: गुरु नानक देव, जिन्हें मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने कैद करके प्रताड़ित करने की कोशिश की। गुरु हरगोबिंद, जिन्हें जहांगीर ने कैद कर लिया था और बाद में उन्होंने मुगल सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी। गुरु गोबिंद सिंह, जिन्होंने मुगल और अफगान सेनाओं के खिलाफ लड़ाई लड़ी और इन लड़ाइयों में अपने बेटों को खो दिया।
इन घटनाओं ने सिख इतिहास और सिख धर्म को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत के संत समाज, सिख समुदाय और राजपूत और मराठों को स्वतंत्रता सैनानी ही कहना चाहिए।
ब्रिटिश शासन 1700 से 1947
अंग्रेज भारत में व्यापार करने आए और धीरे धीरे यहां के शासक बन बैठे। उनका संक्षिप्त इतिहास इस प्रकार है।
चरण 1: व्यापारिक चौकियों की स्थापना (1750 का दशक) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (BEIC) ने भारत में, विशेष रूप से बंगाल, मद्रास और बॉम्बे में व्यापारिक चौकियाँ स्थापित कीं।
चरण 2: प्लासी की लड़ाई (1757) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल के शासक सिराजुद्दौला को हराया, जिससे भारत में ब्रिटिश राजनीतिक प्रभाव की शुरुआत हुई।
चरण 3: विस्तार और एकीकरण (1760-1780 का दशक): ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्थानीय शासकों के साथ संधियों, लड़ाइयों और रणनीतिक गठबंधनों के माध्यम से अपने क्षेत्रों का विस्तार किया। ब्रिटिश सरकार ने भारत में कंपनी की गतिविधियों पर नियंत्रण करना शुरू किया।
चरण 4: ब्रिटिश प्रशासन की स्थापना (1780-1810 का दशक) ब्रिटिश सरकार ने भारतीय मामलों की देखरेख के लिए गवर्नर-जनरल नियुक्त किए। ब्रिटिश कानूनों, संस्थाओं और प्रशासनिक प्रणालियों का परिचय।
चरण 5: एंग्लो-मैसूर युद्ध और एंग्लो-मराठा युद्ध (1790-1810) ब्रिटिशों ने मैसूर और मराठा जैसे शक्तिशाली भारतीय राज्यों को हराया, और अपना नियंत्रण बढ़ाया।
चरण 6: भारतीय राज्यों का विलय (1810-1850) ब्रिटिशों ने डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स, सहायक गठबंधनों और सैन्य विजय के माध्यम से भारतीय राज्यों को अपने में मिला लिया।
चरण 7: 1857 का भारतीय विद्रोह और प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन (1858) ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय विद्रोह विफल हो गया, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का विघटन हुआ और ब्रिटिश क्राउन के अधीन प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन हुआ।
चरण 8: समेकन और विस्तार (1858-1947) ब्रिटिश भारत का विस्तार हुआ और इसमें वर्तमान पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल के कुछ हिस्से शामिल हो गए। ब्रिटिश शासन मजबूत हुआ, भारत ब्रिटिश साम्राज्य का मुकुटमणि बन गया।
ये चरण भारत में ब्रिटिश प्रभाव और नियंत्रण के क्रमिक विस्तार को दर्शाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप लगभग दो शताब्दियों तक उपमहाद्वीप पर उनका शासन रहा।
गौरतलब है कि शासक अपने साथ संस्कृति भी लेकर आता है। 200 वर्ष के ब्रिटिश राज में भारत में सांस्कृतिक, आर्थिक और प्रशासनिक प्रभाव हुए। ईसाई स्कूल और अस्पताल, भारतीय सेना, प्रशासन और नौकरशाही, न्यायतंत्र और कोर्ट कचहरी, विस्तृत रेल नेटवर्क यह सब ब्रिटिश राज की देन है। ब्रिटिश राज में भारत की संपत्ति को खूब लूटा गया। इसी कारण भारत में स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी ने 1857 में विकराल रूप लिया परंतु इस को दबा दिया गया। बाद में देश के संवेदनशील और प्रज्ञावान कुलीन वर्ग ने स्वतंत्रता संग्राम के सैनानी उत्पन किए। स्वामी दयानंद सरस्वती, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, स्वामी विवेकानंद इत्यादि की प्रेरणा से देश में स्वतंत्रता संग्राम की लहर उठी जिस में कांग्रेस और उस के नेताओं का नाम अग्रणी है। प्रस्तुत है संक्षेप में स्वतंत्र संग्राम।
भारत का स्वतंत्रता संग्राम, भारत में ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए दशकों तक चला एक प्रयास था। यहाँ एक संक्षिप्त अवलोकन दिया गया है:
1. 1857 का भारतीय विद्रोह: ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहला बड़ा विद्रोह।
2. 1905 में चम्पारण में सर्वप्रथम गाँधी जी के नेतृत्व में सत्याग्रह।
3. असहयोग आंदोलन (1920-1922)*: महात्मा गांधी के नेतृत्व में, भारतीयों ने ब्रिटिश अधिकारियों के साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया।
4. नमक मार्च (1930): नमक कर का विरोध करने के लिए गांधी का प्रसिद्ध मार्च।
5. भारत छोड़ो आंदोलन (1942): तत्काल स्वतंत्रता की मांग करने वाला एक विशाल सविनय अवज्ञा आंदोलन।
6. भारतीय राष्ट्रीय सेना (1942-1945): सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में, एक सशस्त्र बल ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध लड़ाई लड़ी।
सदियों के औपनिवेशिक शासन के बाद, 1947 में ब्रिटिशों ने कई कारकों के संयोजन के कारण भारत को स्वतंत्रता देने का फैसला किया। यह कारक कुछ इस प्रकार हैं।
1. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन: महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 20वीं सदी की शुरुआत से ही स्वतंत्रता के लिए लड़ रही थी।
2. द्वितीय विश्व युद्ध: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की कमज़ोर अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति ने भारत पर नियंत्रण बनाए रखना मुश्किल बना दिया।
3. भारत छोड़ो आंदोलन: गांधी के नेतृत्व में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने तत्काल स्वतंत्रता की मांग की, जिससे ब्रिटिशों पर और दबाव पड़ा।
4. अंतर्राष्ट्रीय दबाव: महाशक्तियों के रूप में उभर रहे संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ ने भारतीय स्वतंत्रता का समर्थन किया।
5. आर्थिक बोझ: भारत पर नियंत्रण बनाए रखना ब्रिटेन के लिए आर्थिक रूप से असहयोगी होता जा रहा था।
6. ब्रिटिश राजनीति में बदलाव: 1945 में सत्ता में आई लेबर पार्टी कंज़र्वेटिवों की तुलना में भारतीय स्वतंत्रता के प्रति अधिक सहानुभूति रखती थी।
7. भारतीय राष्ट्रीय सेना: सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय सेना ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानियों के साथ मिलकर ब्रिटिश सत्ता को और चुनौती दी।
8. रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह: भारतीय राष्ट्रीय सेना से प्रेरित 1946 के रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह ने अंग्रेजों को दिखा दिया कि उनका नियंत्रण खिसक रहा है।
20 फरवरी, 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने जून 1948 तक भारत को सत्ता हस्तांतरित करने के इरादे की घोषणा की। हालांकि, भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने इस प्रक्रिया को तेज कर दिया और 15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली।
भाग 3: स्वतंत्रता के बाद का युग: 15 अगस्त, 2024 को मनाया जाने वाला भारत का 78वाँ स्वतंत्रता दिवस, प्रगति, आत्मनिर्भरता और वैश्विक मान्यता की दिशा में राष्ट्र की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। जब हम पिछले लगभग आठ दशकों पर विचार करते हैं, तो हम विजय को स्वीकार करते हैं, असफलताओं से सीखते हैं और अपने संस्थापकों के आदर्शों के प्रति फिर से प्रतिबद्ध होते हैं।
1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से, भारत ने उल्लेखनीय परिवर्तन का मार्ग तय किया है। एक नवजात लोकतंत्र से एक जीवंत, विविध राष्ट्र तक, भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में जबरदस्त प्रगति की है। पहली बार सम्पूर्ण भारत ने एक संविधान को अपनाया। जभारत छोड़ कर गए तो भारत में 563 रियासतें थी। सरदार पटेल के अथक प्रयासों से इन सब रियासतों को भारतीय गणराज्य में मिलान कर दिया गया और रियासतों को राजा महाराजा को प्रिवी पर्स दिए गए जो बाद में इंदिरा सर्कार में ख़त्म कर दिए गए।
-देश दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित हुआ; नवाचार और प्रौद्योगिकी का केंद्र बना; अंतरिक्ष अन्वेषण में वैश्विक नेता के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत किया; परंपरा को आधुनिकता के साथ मिलाते हुए एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा दिया; गरीबी से लेकर महामारी तक की चुनौतियों का सामना करने में लचीलापन दिखाया।
इन उपलब्धियों के बावजूद, भारत अभी भी दबाव वाले मुद्दों से जूझ रहा है: आर्थिक असमानताएँ और सामाजिक असमानताएँ; पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन; राजनीतिक ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक तनाव; शैक्षिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ।
इस 78वी वर्षगांठ का जश्न मनाते समय, हम उन दूरदर्शी लोगों का याद करते हैं जिन्होंने हमारे देश को आकार दिया और उनका सम्मान करते हैं। जवाहरलाल नेहरू के समाजवादी आदर्शों से लेकर इंदिरा गांधी के मुखर नेतृत्व तक और नरसिम्हा राव के आर्थिक सुधारों से लेकर मनमोहन सिंह के समावेशी विकास तक, प्रत्येक युग ने भारत के विकास में योगदान दिया है।
आज, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, भारत वैश्वीकरण, राष्ट्रवाद और विकास की जटिलताओं को नेविगेट करना जारी रख रहा है। सरकार के प्रयास जैसे मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और स्वच्छ भारत, का उद्देश्य राष्ट्र को एक उज्जवल भविष्य की ओर ले जाना है।
1947 के पश्चात देश में महत्वपूर्ण पड़ाव इस प्रकार रहे।
नेहरू युग (1947-1964) के दौरान महत्वपूर्ण विकास: पंचवर्षीय योजनाएँ, औद्योगीकरण, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की स्थापना की और औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित किया गया, कृषि सुधार: शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा: सार्वभौमिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पर जोर दिया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन: शीत युद्ध के गुटों से स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना की। विदेश नीति: एशियाई एकजुटता, अफ्रीकी-एशियाई सहयोग और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर ध्यान केंद्रित किया। संवैधानिक संशोधन: संविधान में महत्वपूर्ण बदलाव किए, जिसमें पहला संशोधन (1951) और 17वां संशोधन (1964) शामिल हैं।
इंदिरा युग (1966-1977, 1980-1984) के दौरान महत्वपूर्ण घटनाक्रम: गरीबी हटाओ: "गरीबी उन्मूलन" कार्यक्रम शुरू किया। बैंकों का राष्ट्रीयकरण: प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। हरित क्रांति: कृषि आधुनिकीकरण को जारी रखा और उसका विस्तार किया। परमाणु कार्यक्रम: भारत का पहला परमाणु परीक्षण (1974) किया। विदेश नीति: सोवियत संघ के साथ संबंधों को मजबूत किया और उपनिवेशवाद के खिलाफ एक मजबूत रुख बनाए रखा। आपातकाल (1975-1977): नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को निलंबित करते हुए राष्ट्रीय आपातकाल लगाया। आर्थिक सुधार: कुछ आर्थिक उदारीकरण उपाय पेश किए। सामाजिक कल्याण कार्यक्रम: एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए।
इन विकासों का भारत के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर स्थायी प्रभाव पड़ा, जिसने देश की प्रगति को आकार दिया और भविष्य की नीतियों को प्रभावित किया।
1991 के बाद से 1998 तक भारत में महत्वपूर्ण विकास: नरसिंह राव-मनमोहन सिंह टीम (1991-1996) ने आर्थिक सुधारों और उदारीकरण प्रक्रिया का नेतृत्व किया।
1. आर्थिक उदारीकरण (1991): भारत ने व्यापक आर्थिक सुधार पेश किए, वैश्वीकरण और बाजार-उन्मुख नीतियों के लिए खुलापन लाया।
2. नई औद्योगिक नीति (1991): विदेशी निवेश, निजीकरण और विनियमन को प्रोत्साहित किया।
3. व्यापार नीति सुधार (1991): सरलीकृत और उदारीकृत व्यापार नीतियाँ।
4. विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (1993): विदेशी मुद्रा लेनदेन का प्रबंधन करने के लिए पेश किया गया।
5. बुनियादी ढांचे का विकास (1990 का दशक): सड़कों, राजमार्गों, हवाई अड्डों और दूरसंचार के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया गया।
6. सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) बूम (1990 का दशक): भारत एक प्रमुख आईटी हब के रूप में उभरा, जिसमें बैंगलोर "भारत की सिलिकॉन वैली" बन गया।
वाजपई के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार (1996-1998): वाजपई के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने आर्थिक सुधारों को जारी रखा। पोखरण-II परमाणु परीक्षण (1998): भारत ने परमाणु परीक्षण किए, खुद को परमाणु हथियार संपन्न देश घोषित किया। कारगिल युद्ध (1999): कश्मीर में पाकिस्तान के साथ एक सीमित युद्ध।
इन घटनाक्रमों ने भारत की अर्थव्यवस्था को बदल दिया, इसे और अधिक बाजार-उन्मुख और वैश्विक रूप से एकीकृत बना दिया। आईटी बूम और बुनियादी ढांचे के विकास ने भारत के भविष्य के विकास की नींव भी रखी।
2004 से 2014 तक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दौरान, भारत ने महत्वपूर्ण आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास का अनुभव किया। यहाँ एक संक्षिप्त अवलोकन दिया गया है:
आर्थिक सुधार:
- उच्च जीडीपी विकास दर (औसतन 8% प्रति वर्ष)
- उदारीकरण और निजीकरण की पहल
- आधार विशिष्ट पहचान कार्यक्रम की शुरूआत
सामाजिक कल्याण:
- सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम का कार्यान्वयन
- नौकरी की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एनआरईजीए)
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और मध्याह्न भोजन योजना जैसे सामाजिक कार्यक्रमों का विस्तार
बुनियादी ढांचे का विकास:
- सड़कों, राजमार्गों और परिवहन नेटवर्क में निवेश में वृद्धि
- दूरसंचार और आईटी क्षेत्रों का विस्तार
विदेश नीति:
- संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ संबंधों को मजबूत किया
- क्षेत्रीय पहलों के माध्यम से पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में सुधार
चुनौतियाँ:
- भ्रष्टाचार घोटाले (जैसे, 2 जी स्पेक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेल)
- मुद्रास्फीति और मूल्य वृद्धि की चिंताएँ
- क्षेत्रीय असमानताएँ और सामाजिक असमानताएँ बढ़ रही हैं
प्रमुख नेता:
- प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह (2004-2014)
- कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी
- पी. चिदंबरम (वित्त), ए. के. एंटनी (रक्षा) और कपिल सिब्बल (मानव संसाधन विकास) जैसे प्रमुख मंत्री
कुल मिलाकर, यूपीए सरकार के कार्यकाल में महत्वपूर्ण आर्थिक विकास, सामाजिक कल्याण पहल और बुनियादी ढांचे का विकास हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार के घोटालों और क्षेत्रीय असमानताओं से भी जूझना पड़ा।
भाजपा और मोदी युग (2014 से 2024 और निरंतर) के दौरान महत्वपूर्ण विकास: 2014 से भारत में नरेंदर मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को बहुमत मिला। भाजपा के साथ अन्य पार्टिओं के साथ मिलकर नेशनल डेमोक्रेटिक अलायन्स ने हाल ही में तीसरी बार सरकार बनाई है। इस सरकार ने अपनी उपलब्धिओं का काफी प्रचार और प्रसार किआ है। यह इस प्रकार हैं:
1. आर्थिक सुधार: मेक इन इंडिया (2014); वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) कार्यान्वयन (2017); दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (2016) और विमुद्रीकरण (2016)
2. बुनियादी ढांचे का विकास: सड़कों, राजमार्गों और हवाई अड्डों का विस्तार; वनडे भारत ट्रेनों और मेट्रो परियोजनाओं की शुरूआत; स्मार्ट सिटी मिशन।
3. सामाजिक क्षेत्र सुधार: स्वच्छ भारत अभियान (स्वच्छ भारत मिशन); आयुष्मान भारत (राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना); प्रधानमंत्री जन धन योजना (वित्तीय समावेशन)
4. विदेश नीति पहल: एक्ट ईस्ट नीति (आसियान के साथ जुड़ाव); पड़ोस पहले नीति; अमेरिका, इजरायल और खाड़ी देशों के साथ मजबूत संबंध।
5. राष्ट्रीय सुरक्षा: पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक (2016) और बालाकोट एयरस्ट्राइक (2019); सैन्य आधुनिकीकरण को मजबूत किया
6. डिजिटल इंडिया पहल: डिजिटल बुनियादी ढांचे और सेवाओं का विस्तार; ई-गवर्नेंस और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा।
7. पर्यावरण और ऊर्जा नीति: अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए); पेरिस जलवायु समझौते के प्रति प्रतिबद्धता
8. चुनौतियाँ और विवाद: नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी); अनुच्छेद 370 निरस्तीकरण (जम्मू और कश्मीर); कोविड-19 महामारी से निपटने की आलोचना।
मोदी के कार्यकाल में महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार, बुनियादी ढांचे का विकास और सामाजिक क्षेत्र की पहल देखी गई है। हालाँकि, उनकी सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरणीय मुद्दों और सामाजिक तनावों से निपटने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है।
मोदी सर्कार ने 2047 के लिए भारत के विजन, जो इसकी स्वतंत्रता की शताब्दी है, इस में शामिल हैं:
1. 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना: 2025 तक जीडीपी को दोगुना करके 5 ट्रिलियन डॉलर करना। उच्च-मध्यम आय का दर्जा प्राप्त करना
2. सतत विकास: संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करना। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर संक्रमण। कार्बन फुटप्रिंट को कम करना
3 डिजिटल इंडिया: डिजिटल बुनियादी ढांचे और सेवाओं का विस्तार करना। ई-गवर्नेंस और डिजिटल साक्षरता को बढ़ाना। बुनियादी ढांचे का विकास_:
4.100 स्मार्ट शहरों का निर्माण करना
5. परिवहन नेटवर्क (सड़क, रेलवे, हवाई अड्डे) का विस्तार करना
6. जल और स्वच्छता सुविधाओं को बढ़ाना
7.मानव विकास_: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक सार्वभौमिक पहुँच. गरीबी और असमानता को कम करना । महिलाओं और हाशिए पर पड़े समुदायों को सशक्त बनाना
6. नवाचार और उद्यमिता: स्टार्टअप और नवाचार को प्रोत्साहित करना। अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना। कौशल और रोजगार क्षमता को बढ़ाना
7. विदेश नीति और वैश्विक नेतृत्व। अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी को मजबूत करना। वैश्विक शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना। भारतीय संस्कृति और मूल्यों को बढ़ावा देना
8. राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा: रक्षा बलों का आधुनिकीकरण करना। साइबर सुरक्षा को बढ़ाना। सीमा सुरक्षा को मजबूत करना
9. शासन और संस्थागत सुधार: पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाना। नौकरशाही को सुव्यवस्थित करना। संस्थानों को मजबूत करना
10. सांस्कृतिक पुनर्जागरण: भारतीय विरासत को संरक्षित और बढ़ावा देना। कला, संस्कृति और पर्यटन को प्रोत्साहित करना। राष्ट्रीय गौरव और एकता को बढ़ावा देना
इस विजन का उद्देश्य भारत को लोकतंत्र, समावेशिता और नवाचार के सिद्धांतों पर निर्मित एक समृद्ध, टिकाऊ और वैश्विक रूप से प्रभावशाली राष्ट्र में बदलना है।
परंतु यह विजन बीजेपी के नेतृत्व में NDA का है जो गए 10 वर्ष से शासन कर रही है और अब तीसरी बार सरकार बना पाई है। कांग्रेस के नेतृत्व में I.N.D गठबंधन के इन से मतभेद हैं।
भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए और कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए/कांग्रेस की नीतियों के बीच मुख्य अंतर इस प्रकार हैं:
अर्थव्यवस्था
- भाजपा: व्यापार समर्थक, बाजारोन्मुखी और वैश्वीकरण-केंद्रित
- कांग्रेस: अधिक समाजवादी, कल्याण कार्यक्रमों और सरकारी हस्तक्षेप पर जोर
बुनियादी ढांचा
- भाजपा: बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटी जैसी बड़े पैमाने की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित
- कांग्रेस: ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास और सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों पर जोर
सामाजिक कल्याण
- भाजपा: आयुष्मान भारत और पीएमजेडीवाई जैसे लक्षित कल्याण कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित
- कांग्रेस: मनरेगा और एनएफएसए जैसी व्यापक सामाजिक कल्याण योजनाओं पर जोर
विदेश नीति
- भाजपा: क्षेत्रीय नेतृत्व पर ध्यान केंद्रित करते हुए अधिक मुखर और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण
- कांग्रेस: वैश्विक साझेदारी पर ध्यान केंद्रित करते हुए अधिक कूटनीतिक और समावेशी दृष्टिकोण
राष्ट्रीय सुरक्षा
- भाजपा: सैन्य आधुनिकीकरण और मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा रुख पर ध्यान केंद्रित
- कांग्रेस: क्षेत्रीय सहयोग पर ध्यान केंद्रित करते हुए कूटनीति और संवाद पर जोर
शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा
- भाजपा: निजीकरण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर ध्यान
- कांग्रेस: सरकारी वित्तपोषित कार्यक्रमों और सामाजिक क्षेत्र के व्यय पर जोर
पर्यावरण नीति
- भाजपा: आर्थिक वृद्धि और औद्योगिक विकास पर ध्यान
- कांग्रेस: पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास पर जोर
कृषि
- भाजपा: बाजारोन्मुखी सुधारों और किसान आय समर्थन पर ध्यान
- कांग्रेस: किसान कल्याण कार्यक्रमों और कृषि सब्सिडी पर जोर
सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दे
- भाजपा: हिंदू संस्कृति और मूल्यों को बढ़ावा देने पर ध्यान
- कांग्रेस: धर्मनिरपेक्षता और समावेशिता पर जोर
नोट: ये अंतर सामान्य रुझान हैं और संपूर्ण नहीं हैं, क्योंकि प्रत्येक पार्टी के दृष्टिकोण के भीतर व्यक्तिगत नीतियां ओवरलैप या भिन्न हो सकती हैं।
भारत का विपक्ष: मई 2024 में मोदी सरकार ने तीसरी बार शपथ ली। परन्तु इस बार विपक्ष कुछ आक्रामक नज़र आ रहा है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस जो की विपक्ष की मुख्य पार्टी है अपने वैचारिक रुख पर पुनर्विचार करते हुए चौराहे पर खड़ी नजर आ रही है। कांग्रेस के प्रमुख नेता राहुल गांधी का हाल ही में जोर इस पर रहा है: गरीब समर्थक नीतियां; बड़े उद्योग और क्रोनी पूंजीवाद की आलोचना; सब्सिडी और कल्याणकारी कार्यक्रमों का प्रस्ताव। यह नेहरू और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पार्टी के पहले के दौर की याद दिलाते हुए, अधिक समाजवादी और लोकलुभावन दृष्टिकोण की ओर बदलाव को दर्शाता है। यह दिशा नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गई आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की पहल को उलटती हुई प्रतीत होती है, जिसने भारत की अर्थव्यवस्था को बदल दिया था।
कांग्रेस के बदलते रुख के पीछे निम्नलिखित कारण हो सकते हैं: राजनीतिक परिदृश्य और जनता की भावना में बदलाव; भाजपा के प्रभुत्व और कथित व्यापार समर्थक नीतियों के प्रति प्रतिक्रिया; गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों के बीच अपने पारंपरिक आधार को पुनः प्राप्त करने का प्रयास। हालाँकि, यह बदलाव निम्नलिखित के बारे में भी सवाल उठाता है: आर्थिक नीतियों में निरंतरता; सामाजिक कल्याण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन; अपने वैचारिक रुख पर स्पष्टता।
कांग्रेस को भारत के भविष्य के लिए एक स्पष्ट और सुसंगत दृष्टिकोण बनाए रखते हुए, अपनी समाजवादी जड़ों और वैश्वीकृत दुनिया की आर्थिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। कई बार तो ऐसे लगता है कि राहुल गांधी एक भ्रमित व्यक्ति हैं जो चालाकी से खेलने की कोशिश कर रहे हैं?
इस सब के मद्देनजर हम कह सकते हैं कि भारत का भविष्य आशाजनक है, जिसमें महत्वपूर्ण वृद्धि और विकास की संभावना है। भारत के 2030 तक तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की उम्मीद है, जो युवा आबादी, शहरीकरण और डिजिटलीकरण द्वारा संचालित है। भारत संभवतः आईटी, एआई और उभरती प्रौद्योगिकियों में उत्कृष्टता प्राप्त करना जारी रखेगा, और नवाचार के लिए एक वैश्विक केंद्र बन जाएगा। भारत का लक्ष्य नवीकरणीय ऊर्जा में अग्रणी बनना है, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना और जलवायु परिवर्तन को कम करना है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम संभावित चंद्रमा और मंगल मिशनों के साथ आगे बढ़ना जारी रखेगा। भारत संभवतः अपनी आर्थिक और सांस्कृतिक शक्तियों का लाभ उठाते हुए वैश्विक मामलों में बड़ी भूमिका निभाएग। भारत की युवा आबादी विकास, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देगी। भारत बुनियादी ढांचे में निवेश करना जारी रखेगा, कनेक्टिविटी और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करेगा। भारत वैश्विक मांगों को पूरा करने के लिए अपने कर्मचारियों को बेहतर बनाने और फिर से कुशल बनाने पर ध्यान केंद्रित करेगा। भारत पारंपरिक प्रथाओं और आधुनिक चिकित्सा का लाभ उठाते हुए स्वास्थ्य सेवा और कल्याण को प्राथमिकता देगा। भारत अपनी विविधता और विरासत का जश्न मनाते हुए सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अनुभव करेगा।
हालाँकि, भारत को चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है इन में प्रमुख हैं असमानता और गरीबी, पर्यावरण का क्षरण, जलवायु परिवर्तन, राजनीतिक ध्रुवीकरण, क्षेत्रीय असमानताएँ इत्यादि इत्यादि।
भारत की पूरी क्षमता को साकार करने के लिए इन चुनौतियों का समाधान करना महत्वपूर्ण होगा। आशा करते हैं भारत 78 वी आजादी वर्षगांठ के इस शुभ अवसर पर आपने समक्ष चुनौतियों का मुकाबला कर के प्रगति और शांति के राह पर अग्रसर रहे गा। यही शुभेच्छा है।
सतीश कालरा
ऋषिकेश
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